देखो आज पुकार रही हैं, चींख- चींख कर  धरती माई……..पृथ्वी दिवस विशेष ।

देखो आज पुकार रही हैं, चींख- चींख कर  धरती माई,
मेरे  उपकारो  की किमत , हाय !  ये तुने  कैसे चुकाई,

बिलख रही आज ये पृथ्वी, माँ धरती ने आवाज लगाई,
मानव तेरे  स्वार्थीपन में देख  प्रकृती  कितनी  मुरझाई,

गंगा  की  पावन  धारा संग, हमने ही मलीनता मिलाई ,

कोमल मानव मन में , इतनी  कुटिलता  आज  समाई,

मैने  तुझे  फल-फुल थे सौंपे , पेट ही मैंने भरा था तेरा,
तुने  किमत  कैसे  चुकाई  क्या  कसुर  था बतला मेरा,

मैंने  हीरे – मोती  उगले  सीने पर अन्न कि की उगवाई,
रसायनो  से मिट्टी की शक्ति घटाई  तूने ही की चरवाई,

वसुंधरा  अब  त्रस्त हुई , अब बता कौन  करें  भरपाई,
सुंदर हरी-भरी बस्ती को तुने पल भर में  आग  लगाई,

नीलांबर  में  देखो  आज ज़हर  की काली घटा है छाई,
हाय! कैसी लाचार हुई मैं, अब बारी प्रतिशोध की आई,

अवसर दू  मैं सुधरजा  मानव, अब अति होने को आई,
तु  स्वार्थीपन को छोड़,अन्यथा  दुनियाँ करेगी  भरपाई|

पूजा अग्रवाल (बड़वानी)

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One comment

  1. बहुत सुंदर 👌 👌

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